कुछ अधूरा से रह गया
शायद उस एक मुलाकात में
कुछ लफ्ज होठो तक आ के
रह गए अनकहे से उस बात में
वो थे इतने करीब मेरे पर
फिर भी इतने दूर थे
अपने को अपना न कह सके
इतने क्यों हम मजबूर थे
न दिखते है खुली आँखों से
जाने कैसा ये बंधन है
जो उड़ने से रोक देता है
ये अपना कैसा जीवन है
तुम मेरे ,मैं तुम्हारी हूँ
ये जनता है हमारा दिल
शायद जरूरी थी ये दूरी
पाने को अपनी मंजिल