Saturday, December 15, 2018

अपने दोस्त

भीड़ में भी खुद को अकेला पाया है
जाने क्यों फिर एक आंसू छलक आया है
खुश सब लोग है पर जाने में खुश क्यू नही
जाने किस गम ने मुझे इतना सताया है
दोस्त भी हर पल साथ कहाँ होते है
अपने भी कभी दूर कभी पास होते है
जरूरत हो तो दूसरे के पास भी वक़्त हो
ऐसे इतेफाक  यहां भी कम ही होते हैं
फिर कैसे अकेलेपन को दूर भगाये हम
कैसे फिर से मुस्कुराये कैसे खिलखिलाए हम
शायद दुसरो में दोस्त ढूंढना नही गलत था
क्यों न अपने ही दोस्त बन जाए हम

Tuesday, December 11, 2018

मेरी पहचान

मेरे सिमटे से पंखों को
उड़ना सिखाया किसने
ये हौसला मेरी हिम्मत का था
या असर तेरी मोहब्बत का
किसी ने बांध दिए थे
जैसे कदमो को मेरे
ख्वाहिश तो बहुत थी
कमी बस एक कोशिश की थी
मुझे उस कोशिश की ओर बढ़ाया तुमने
मुझे फिर से जीना सिखाया तुमने
तुमने जो राह चुनी उसमे मैं चल पड़ी
उस भीड़ में अपनी पहचान मिली