Wednesday, August 28, 2019

द्वन्द

कभी बन कर पतंग छूने को 
आकाश कभी उड़ जाती हूँ 
कभी मुस्कुराते फूलो जैसे 
धरती पर भी इठलाती हूँ 

कभी कुछ ही शब्दों में 
सारा भेद कह जाती हूँ 
कभी अपने अहसासों में मैं 
शब्दों में पिरो ना पाती हूँ 

ये द्वन्द है मन का मस्तिष्क से 
ये बात समझ भी जाती हूँ 
किसे जीतने  दूं  मैं फिर 
बस ये ही समझ ना पाती हूँ 

मन तो बस मन की सुनता है 
क्या उसमे ही बहती जाती हूँ 
क्या सही या गलत जाने मस्तिष्क 
ये बात भी मन को समझती हूँ 

 ये सारी  दुविधा जाने कैसे
मैं  मुझ से द्वन्द कराती हूँ 
खुद से ही जीत जाती हूँ 
खुद से ही हार जाती हूँ