कभी बन कर पतंग छूने को
आकाश कभी उड़ जाती हूँ
कभी मुस्कुराते फूलो जैसे
धरती पर भी इठलाती हूँ
कभी कुछ ही शब्दों में
सारा भेद कह जाती हूँ
कभी अपने अहसासों में मैं
शब्दों में पिरो ना पाती हूँ
ये द्वन्द है मन का मस्तिष्क से
ये बात समझ भी जाती हूँ
किसे जीतने दूं मैं फिर
बस ये ही समझ ना पाती हूँ
मन तो बस मन की सुनता है
क्या उसमे ही बहती जाती हूँ
क्या सही या गलत जाने मस्तिष्क
ये बात भी मन को समझती हूँ
ये सारी दुविधा जाने कैसे
मैं मुझ से द्वन्द कराती हूँ
खुद से ही जीत जाती हूँ
खुद से ही हार जाती हूँ
आकाश कभी उड़ जाती हूँ
कभी मुस्कुराते फूलो जैसे
धरती पर भी इठलाती हूँ
कभी कुछ ही शब्दों में
सारा भेद कह जाती हूँ
कभी अपने अहसासों में मैं
शब्दों में पिरो ना पाती हूँ
ये द्वन्द है मन का मस्तिष्क से
ये बात समझ भी जाती हूँ
किसे जीतने दूं मैं फिर
बस ये ही समझ ना पाती हूँ
मन तो बस मन की सुनता है
क्या उसमे ही बहती जाती हूँ
क्या सही या गलत जाने मस्तिष्क
ये बात भी मन को समझती हूँ
ये सारी दुविधा जाने कैसे
मैं मुझ से द्वन्द कराती हूँ
खुद से ही जीत जाती हूँ
खुद से ही हार जाती हूँ
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