चल पड़ी थी मैं तो आज मदमस्त मस्ती में
चली करने सागर पार कागज की कश्ती में
शीतल सी हवा fc जैसे कुछ कहती गयी
हवा की दिशा में मेरी कश्ती बहती गयी
लहरे ले कर मुझे अपने साथ बढ़ाती रही
मै भी अपनी सफलता पर इठलाती रही
फिर अचानक लहरो ने बदल दी दिशा
दूसरी ओर बहने लगी फिर वो हवा
फिर उन्ही लहरो ने आगे जाने न दिया
जहाँ से किया था शुरू वहाँ छोड़ दिया
वो कश्ती सागर में कही खो गयी
मैं साहिल पर फिर से तन्हा हो गयी
ये समझा अगर सागर में उतर जाना होगा
पहले कश्ती को मजबूती से बनाना होगा
फिर चल पड़ी अपनी कश्ती बनाने के लिए
फिर से सागर से दूर निकल जाने के लिए
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