Wednesday, January 3, 2018

कुछ अनकही

वो धीरे से मुस्कुरा कर 
मेरी मुस्कराहट छीन लेते है 
वो धीरे बोल के निकल जाते है 
मेरी नींदें छीन लेते है 

न कुछ बोल पाते है 
न चुप ही रह पाते है 
जो अनकही सी रह जाती है 
वो इतनी सारी  बाते है 

शायद खामोशिया मेरी 
सब कुछ ठीक कर देंगी 
जो कह कर न कह सके 
वो तुमको बयां कर देगी 


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