कि तुम कुछ और न समझ जाओ
मेरे अल्फ़ाज़ कुछ और बोले
तुम उसे इजहार न समझ जाओ
तुम्हे एक दोस्त समझा था लेकिन
तुम्हारे दिल में अहसास कुछ और थे
तुम्हे हमराज बनाया था लेकिन
तुम्हारे राज़ कुछ और थे
फिर ख़ामोशी को मैंने अपना लिया
कि तुम फिर न इधर आओ
मेरे अल्फ़ाज़ कुछ और बोले
तुम कुछ और न समझ जाओ
ना दोस्त बन पाए न हमराज़
ना कोई और नाम दे पाए
ख़ामोशी को ही अपना लिया
बदल ली अपनी राहे
No comments:
Post a Comment