Monday, October 12, 2020

बचपन की कहानी

 आज भी बचपन की कहानी याद आती है

हमारा ख्याल रखती दादी नानी याद आती है

वो किसी धागे से बांध देती थी सारा परिवार

कैसे मिल कर मनाते थे हम सारे त्योहार

वो होली में अनगिनत रंगों में रंग जाना

दशरहे पर मेला सब बच्चो का साथ में जाना

घर मे जाते ही ढूंढते थे बाबा की अलमारी

उन बिस्किट के पैकेट में छुपी थी खुशी हमारी

वो घंटो बाबा से सुनना अपने पूर्वजो की बातें

हँसते खेलते कट जाती थी सारी दिन रातें

अम्मा ने सारे रस्म सारे व्रत सबको सिखाये

वही त्योहार सारे परिवार को जोड़ते आये

नाना नानी ढेरो खिलोने ले कर आना

बच्चो से साथ फिर बच्चो सा बन जाना

आज चाहे रिश्तो में थोड़ी दी दूरी है

बाबा दादी नाना नानी बच्चो के फिर भी जरूरी है

चाँद का खेल

 छुप कर चाँद बदलो की छाँव में 

कोई खेल खेलता नजर आता है 

जब नज़रे ढूंढ रही उसे बेकरारी से 

वो और छुपता चला जाता है 


उन्हों ने मेरी चाहत को 

चाँद से कुछ यु जोड़ दिया 

चाँद ने भी ना नज़र आ कर

दिल मेरा कुछ तोड़ दिया 


मैं भी जैसे हार कर 

वापस घर को जाने लगी 

चाँद की किरणे भी 

बादलो के पीछे मुश्कुराने लगी 


चुपके से बहने लगी 

मदमस्त सी शीतल हवा 

और चाँद ने धीरे से 

बादलो के पीछे से दर्शन दिया 


मैं चमक सी गयी 

चांदनी की  दोधुली काया में 

मुश्कुरा उठे में मेरे होंठ 

चाँद की इस माया पे

माँ कब वापस आओ गी

 माँ तुम कब वापस आओ गी 


इन नन्हे हाथो ने फिर पूछा 

इन  मासूम आँखों में फिर ढूंढा 

कब मेरा बचपन फिर लौटाओगी 

माँ तुम कब वापस आओ गी 


मैंने खाया या नहीं किसी को ख्याल नहीं 

मेरी मुस्कान या गुस्से पर भी सवाल नहीं

एक निवाला प्यार का फिर कब खिलाओगी 

माँ तुम कब वापस आओ गी 


याद आता है तेरी गोदी में सो जाना 

मेरी हर जिद तेरा ख़ुशी से उठाना 

अपने ममता के खजाने को मुझपे लुटाओगी  

माँ तुम कब वापस आओ गी 


मासूम से होठो ने पूछा जब जब 

सबने बोले  तुम एक सितारा हो अब

फिर मेरी दुनिया को कब चमकाओ गी 

माँ तुम कब वापस आओ गी 


मेरी सब खिलोनो को जैसे चुरा  लिया 

जाने कैसे बड़ो की दुनिया से मिला दिया 

वापस मुझ को बचपन में ले आओगी 

माँ तुम कब वापस आओ गी 


Wednesday, June 17, 2020

Meri Parchai

जो आईने में ये जो दिखता है
दो रूप है या शायद मेरी परछाई है
इन आँखों की चमक के दुनिया के लिए
पर ये आंखे कितने दर्द छुपाई है

लोग मुस्कुराहट तो देख लेते हैं
आंखों का दर्द कहाँ कोई पढ़ पाता है
बाहर का दिखावा  है सब
मन से अंदर कहाँ कोई झांक पाता है

इस मन मे शांति की गहराई है
तो कभी भावनाओ का तूफान भी है
कभी सब खो देने का डर भी है
कभी सब पा लेने का अरमान भी है

खुशनसीब है वो लोग जिनको
भावनाओं को समझने वाला मिल पाता है
कुछ कही बातो के पीछे छुपी 
अनकही बातो को परखने वाला मिल जाता है