Monday, October 12, 2020

चाँद का खेल

 छुप कर चाँद बदलो की छाँव में 

कोई खेल खेलता नजर आता है 

जब नज़रे ढूंढ रही उसे बेकरारी से 

वो और छुपता चला जाता है 


उन्हों ने मेरी चाहत को 

चाँद से कुछ यु जोड़ दिया 

चाँद ने भी ना नज़र आ कर

दिल मेरा कुछ तोड़ दिया 


मैं भी जैसे हार कर 

वापस घर को जाने लगी 

चाँद की किरणे भी 

बादलो के पीछे मुश्कुराने लगी 


चुपके से बहने लगी 

मदमस्त सी शीतल हवा 

और चाँद ने धीरे से 

बादलो के पीछे से दर्शन दिया 


मैं चमक सी गयी 

चांदनी की  दोधुली काया में 

मुश्कुरा उठे में मेरे होंठ 

चाँद की इस माया पे

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