ना जाने जिन्दगी में और कितने गम है
ना जाने कितनी राते और मेरी नम है
दूर से तो अपनों की भीड़ सी लगती है
पास जा के देखो तो बस अकेलापन है
कुछ सूना सा , कुछ खाली सा अदंर है मेरे
जहन में खयालो का समंदर है मेरे
धुंद लेती है तनहईया मुझे हर कोने में
जैसे हर सोच में तनहई का घर है मेरे
दुनिया देखती करती रही मुस्कान मेरी
देख ना पाया कोई उनके पीछे एक दुनिया अँधेरी
कोई ऐसा न मिला दुनिया में कहीं
जो जमाझ जाए बिन कहे सब बातें मेरी
चुप से हम अकेले से किसी मोड़ पर कही
ढूढ़ते रहे किसी अपने को, पर मिला कोई नही
बस चुभती रही तन्हाई इन धडकनों को
बैठे रहे गमसुम तनहा अकेले से यु ही
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