Thursday, February 1, 2018

जाने कैसा मोह

कोई राह अंजनी सी 
हर पल मुझे खींचती है 
मैं ना भी जाना चाहू 
पर उस ओर ही बढ़ती है 

क्या है उस राह में ऐसा 

जो उस और ही खींच जाती हूँ 
जाने कैसा मोह है वो 
जिसमे मैं बधती  जाती हूँ 

जिसकी न थी ख्वाइश कभी 

ऐसे क्यों मन पर छा गया 
जिसके साथ की उम्मीद न थी 
वो साथ दूर इतनी आ गया 

अब चाह के भी जाने क्यों 

उससे दूर न मैं जा पाती हूँ 
जाने कैसा मोह है वो 
जिसमे मैं बधती  जाती हूँ 

शायद मन के एक कोने ने 
कुछ अनकहा चाहा होगा 
शायद उन अहसासों को 
मन न समझ पाया होगा 

अब भी उन अहसासों को 
मैं समझ ना पाती हूँ 
जाने कैसा मोह है वो 
जिसमे मैं बधती  जाती हूँ 


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