कोई राह अंजनी सी
हर पल मुझे खींचती है
मैं ना भी जाना चाहू
पर उस ओर ही बढ़ती है
क्या है उस राह में ऐसा
जो उस और ही खींच जाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
जिसकी न थी ख्वाइश कभी
ऐसे क्यों मन पर छा गया
जिसके साथ की उम्मीद न थी
वो साथ दूर इतनी आ गया
अब चाह के भी जाने क्यों
उससे दूर न मैं जा पाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
शायद मन के एक कोने ने
कुछ अनकहा चाहा होगा
शायद उन अहसासों को
मन न समझ पाया होगा
अब भी उन अहसासों को
मैं समझ ना पाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
हर पल मुझे खींचती है
मैं ना भी जाना चाहू
पर उस ओर ही बढ़ती है
क्या है उस राह में ऐसा
जो उस और ही खींच जाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
जिसकी न थी ख्वाइश कभी
ऐसे क्यों मन पर छा गया
जिसके साथ की उम्मीद न थी
वो साथ दूर इतनी आ गया
अब चाह के भी जाने क्यों
उससे दूर न मैं जा पाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
शायद मन के एक कोने ने
कुछ अनकहा चाहा होगा
शायद उन अहसासों को
मन न समझ पाया होगा
अब भी उन अहसासों को
मैं समझ ना पाती हूँ
जाने कैसा मोह है वो
जिसमे मैं बधती जाती हूँ
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