क्यू रात कुछ ज्यादा लम्बी सी लगी
क्यू सुबह आज गुमसुम सी लगी
क्यू अकेले इतने है हम आज
की खुशिया भी हमे गम सी लगी
रात के तारो में क्यू चमक न थी
आग की ज्वाला में क्यू दहक न थी
क्यू खामोश सी सब हवाए थी
क्यू फूलो में भी कोई महक न थी
जिंदगी इतनी वीरान सी क्यू लगी
दुनिया इतनी हैरान सी क्यू लगी
क्यू इतनी तनहा सी तन्हाई भी
दुनिया इतनी अनजान सी क्यू लगी
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