Friday, May 15, 2009

कशमकश

जिन्दगी इतनी अजीब ही क्यू हो जाती है
कि हर मोड़ इसका अनचाहा सा लगता है
दूर उसी से कर देती है जिंदगी
जो जाना पहचाना सा लगता है

जिसके सपने आँखों में भरती है
उसे फिर क्यू दूर कर देती है जिंदगी
किसी अजनबी को बना के अपना
फिर अजनबी क्यू कर देती है जिंदगी

फिर कोई नया सा मोड़ सा दिखता है
जानू पर उस राह मेरी मंजिल है क्या
जिस लहर में बहती जा रही हूं मैं
उस दिशा में मेरा साहिल है क्या

अजीब सी कशमकश है धडकनों में
किसी से पास हो ने की, किसी से दूर जाने का
कुछ डर सा है अनजाने से कल का
कुछ अहसाह है कुछ छुट जाने का

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