ये शरीर कभी मिट जाए गा
धु धु कर के जल जाएगा
पर कर्म यही रह जाता है
उसको न मिटा कोई पायेगा
न नाम से कोई याद रहे
ये कर्म ही तो नाम देता है
सादिया जिस को स्मरण कर
ऐसा कर्म ही बना देता है
कर्म ही पुण्य देता है
कर्म ही पाप कहलाता है
कर्म पल पल जुड़ कर
जीवन अध्याय बनता जाता है
आज अगर आंखों में आंसू है
तुम्हारे दुनिया ये जाने पर
यू जिये थे तुम अपना जीवन
कर्म रहा यही हमारे मिट जाने पर
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